नमाज़ में हँसने का हुक्म
क्या फ़रमाते हैं उलमा-ए-किराम इस मसले के बारे में कि अगर कोई शख्स नमाज़ पढ़ते हुए हँस पड़े तो उसकी नमाज़ का क्या हुक्म है? क्या सिर्फ मुस्कुराने से भी नमाज़ टूट जाती है, और अगर इतनी आवाज़ से हँसे कि पास खड़े लोग सुन लें तो क्या हुक्म होगा?
नमाज़ में हँसना मना है और नमाज़ की हालत में हँसी से बचना बहुत जरूरी है। अगर नमाज़ पढ़ते हुए सिर्फ मुस्कुराया और आवाज़ बिल्कुल नहीं निकली, तो नमाज़ नहीं टूटेगी। लेकिन अगर हँसने की आवाज़ इतनी हो कि खुद सुनाई दे, तो नमाज़ फ़ासिद हो जाएगी और उसे दोबारा पढ़ना जरूरी होगा। और अगर हँसी इतनी तेज़ हो कि पास खड़ा कोई बालिग़ शख्स भी सुन सके, तो हनफ़ी फ़िक़्ह के अनुसार नमाज़ के साथ वुज़ू भी टूट जाता है। ऐसी सूरत में वुज़ू करके नमाज़ दोबारा पढ़नी होगी। इसलिए नमाज़ में खड़े होते समय दिल और दिमाग को दूसरी बातों से हटाकर पूरी तवज्जो नमाज़ की तरफ रखनी चाहिए। अगर किसी वजह से हँसी आ जाए तो उसे रोकने की पूरी कोशिश करनी चाहिए